देश की न्याय व्यवस्था पर बढ़ता बोझ: 5.41 करोड़ लंबित मामलों ने खड़ा किया गंभीर संकट"यदि न्यायिक सुधारों को लेकर त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो न्याय में देरी की यह समस्या देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए और भी गंभीर चुनौती बन सकती है।"- ठाकुर संजीव कुमार सिंहनई दिल्ली। न्यायहित में, संवैधानिक संकट की इस गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता ठाकुर संजीव कुमार सिंह ने कहा कि देश की न्याय व्यवस्था इस समय अभूतपूर्व दबाव से गुजर रही है। निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लंबित मामलों की संख्या 5 करोड़ 41 लाख के पार पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा न केवल न्यायिक प्रणाली की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने की संवैधानिक गारंटी के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) के 28 दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, देशभर की निचली अदालतों में ही 4.76 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें से 3.65 करोड़ मामले आपराधिक प्रकृति के हैं, जबकि शेष सिविल विवादों से जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त, देश के विभिन्न हाई कोर्ट में 63.67 लाख और सुप्रीम कोर्ट में करीब 19.89 हजार मामले विचाराधीन हैं।अदालतों में लंबित मामले और खाली पदउन्होंने कहा कि न्यायिक पेंडेंसी की गंभीरता को जजों के खाली पद और भी बढ़ा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक पद रिक्त है, जबकि हाई कोर्ट्स में 297 जजों के पद खाली पड़े हैं। निचली अदालतों में यह संख्या और भी चिंताजनक है, जहां 4,855 पद रिक्त हैं। अकेले दिल्ली हाई कोर्ट में ही 15.85 लाख मामले लंबित हैं, जो शहरी न्याय प्रणाली पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।संवैधानिक संकट की चेतावनीइस गंभीर स्थिति पर उन्होंने आगे कहा कि न्यायिक मामलों का बढ़ता बोझ अब केवल आंकड़ों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संभावित संवैधानिक संकट का रूप ले चुका है। उन्होंने कहा कि करोड़ों मामलों की पेंडेंसी न्याय तक सार्थक पहुंच को प्रभावित कर रही है और तत्काल न्यायिक सुधारों की आवश्यकता है।संजीव कुमार सिंह के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का बड़ा हिस्सा विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) का है, जिनमें अधिकांश सेवा, भूमि विवाद तथा सामान्य दीवानी और आपराधिक अपीलों से जुड़े हैं। ऐसे मामलों का निपटारा हाई कोर्ट स्तर पर ही हो जाना चाहिए था।जोनल बेंच की आवश्यकताउन्होंने समाधान के तौर पर सुप्रीम कोर्ट की जोनल बेंच की स्थापना पर गंभीरता से विचार करने की वकालत की। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में चार स्थायी जोनल बेंच और नई दिल्ली में स्थायी संविधान पीठ की स्थापना से न्याय तक पहुंच का विकेंद्रीकरण संभव होगा। इससे वादियों को होने वाली भौगोलिक और आर्थिक परेशानियां कम होंगी और न्याय प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकेगी।सरकार और न्यायपालिका की पहलगौरतलब है कि नवंबर में शपथ ग्रहण से पहले जस्टिस सूर्यकांत ने भी पेंडेंसी को अपनी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा था। उन्होंने कहा था कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर लंबित मामलों को कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। वहीं, पिछले वर्ष 11 जुलाई को विधि मंत्रालय ने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों को निर्देश जारी किए थे कि जिन मामलों में सरकार पक्षकार है, उनके शीघ्र निपटारे को सुनिश्चित किया जाए।आखिर में श्री सिंह ने कहा स्पष्ट है कि यदि न्यायिक सुधारों को लेकर त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो न्याय में देरी की यह समस्या देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए और भी गंभीर चुनौती बन सकती है।
byमीडीया पोलीस टाईम
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