गज़ल हजार जख्म जिस्म पर हर जख्म बोल सक्ता है।सिनाकत करने वाला करले दम बोल सकता है। जुल्मत की हद पार होगर्ई गव्हाई है आज।पुटपाथ पर लुटी दुकाने गम बोल सकता है।। जुल्मत से हुआ लहु लुहान  बुर्जुग बेबस बना।कागज पर लिखा बया और थम बोल सकता है।। तार तार हुई चुनरी  लुटी अस्मत अबली की।सुनने वालो सुनो लहजा नम बोल सकता है।। क्या नही जला बलवे मे क्या क्या बताये।जला हुआ जर्रा सारा आलम बोल सकता है।। मासूम बच्चों  की बिखरी वो लाशे कई पडी।सबूत लाशों का खून गया जम बोल सकता है।। हो गम देखलो नजारा आखों से जुल्मत का।जलता बिखरा नजारा आलम बोल सकता है।। 'शहज़ाद ' अब इन्सानियत ढुंढ़ोंगे सिहासत मे।गजब ढाये तुफानी बम बोल सकता है।। शायर:- मजीदबेग मुगल 'शहज़ाद हिगणघाट, जि, वर्धा  महाराष्ट्र      8329309229860505810

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