रथयात्रा विवाद: तिथियों से आगे बढ़कर परंपरा, आस्था और वैश्विक विस्तार की बहस
एसजेटीए और इस्कॉन के मतभेद ने उठाए कई सवाल; विदेशी भक्तों की भागीदारी, धार्मिक परंपराओं की व्याख्या और जगन्नाथ संस्कृति के वैश्विक प्रसार पर छिड़ी चर्चा
(आगरा दिल्ली विभागीय संपादक संजय सिंह)
कई श्रद्धालुओं का मानना है कि सनातन धर्म के व्यापक हित में दोनों संस्थाओं को संवाद और सहयोग का मार्ग अपनाकर भगवान जगन्नाथ के संदेश को विश्वभर में और अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।
नई दिल्ली/पुरी। भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा को लेकर श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) और इस्कॉन के बीच विवाद केवल तिथियों तक सीमित नहीं रह गया है। यह मतभेद अब धार्मिक परंपराओं की व्याख्या, आचार्य परंपरा, विदेशी भक्तों की भूमिका और जगन्नाथ संस्कृति के वैश्विक विस्तार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों तक पहुंच गया है।
जानकारों के अनुसार, विवाद का एक प्रमुख पहलू विदेशी भक्तों से जुड़ा है। जहां इस्कॉन विश्वभर में हजारों विदेशी श्रद्धालुओं को वैष्णव परंपरा से जोड़कर सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, भारत के बाक़ी मंदिर विदेशी भक्तों को प्रवेश देते हैं। वहीं, पुरी मंदिर में उनके प्रवेश को लेकर लंबे समय से प्रतिबंध बना हुआ है। इसी कारण कई विदेशी सनातन भक्त मंदिर दर्शन से वंचित रह जाते हैं और भारत से मायूस होकर लोट जाते हैं। इस्कॉन ऐसे विदेशी भक्तों को दीक्षा, उपनयन संस्कार और धार्मिक सेवाओं में अवसर प्रदान करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस्कॉन अपने संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद की परंपरा का पालन करते हुए दुनिया भर में रथयात्राओं का आयोजन करता है। वहीं एसजेटीए कुछ आयोजनों की तिथियों को लेकर आपत्ति जताता है। इसी कारण यह बहस और गहरी हो गई है कि क्या यह विवाद केवल परंपराओं की रक्षा तक सीमित है या फिर जगन्नाथ संस्कृति के वैश्विक स्वरूप और विस्तार को लेकर भी दृष्टिकोण का अंतर मौजूद है।
वहीं, कई श्रद्धालुओं का मानना है कि सनातन धर्म के व्यापक हित में दोनों संस्थाओं को संवाद और सहयोग का मार्ग अपनाकर भगवान जगन्नाथ के संदेश को विश्वभर में और अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।

